ستظلين خالدة يا أم سعد

 بقلم سعدي عمار*

بم نبدأ..؟؟هو عنوان يخلد في الذاكرة .يحيي آمال  المستضعفين لعلهم يفيقوا  من  سبات  الاندحار..يذكرني بقول   جاثم على  صدري  لغرهام   غرين..(ان  الفشل  شكل  من  اشكال  الموت..ولكن  الفراق هو  الموت)

 

بم أبدا..؟؟ها أنت يا ام سعد  بغيا بك   قد  أيقظت  حواسي  النائمة ..وأنعشت  حماسي  الممطر  ضجرا..هاأنذا يا أمي    بمرور أربعين يوما  على  رحيلك  أوقف  حدادي..ولكنني  سأظل  امتلك  ذكرى  لمساتنا  المسروقة.

كان يا  أمي  وحده  الزلزال   قد  يمزج  بقايانا  ورمادنا..بعد  ان حرمتنا  الحياة..اقصد  التي فرضها الاحتلال  اللص  البغيض..كان  وقع  ذلك  علينا  فيه بصيص  أمل..لكن  هذه  الفترة..الانتكاسة..التي  نعيش  ومفروضة  علينا من  أبناء  جلدتنا..فوقعها  علينا يختلف  تماما..حياة الحرمان يا  خالدة  من  فرحة  لقاء..

انها  الجمعة  الحزينة  يا  خالدة وانا  العاشق الحزين..ستظلي  يا  ام سعد  مصلوبة  داخل  جسدي..وانا اليوم  يا  ماجدة  لا اعرف  متى  يلملم  قلبي  الضال  مواسم  جنونه..ومتى  تحنو  القسوة  على  ذاتها..وترق  الشراسة  على   جروحها.

من  يا  ام  الرجال  يدلي  للعاشق  بالقبل  والأشعار..اقسم  يا ام  سعد  ان  الحجارة  تقاسمني  الحزن..والمطر  صار  يقاسمني ذلك..وارضي  تطعمني  قبلة  أتمناها..والسياط  تطعمني  الصمت.

وفيما  تساءلت  ذات  مساء  من الحزن  عمن  سيعيدنا   الى  آمالنا  التي  بتنا  نفتقدها..هل  اقتسام  الوطن  والتصفيات  كانت  هي  البديل؟؟!!اسالكم   عن مسرحيتكم  التي  جسدتموها  بالدم   والنار..!!

تبكي  التماسيح..تتباطا  السلحفاء  خدرا..ترفض  حتي  ان  تكمل  المسير..

وتحتويني  زهرة  الحزن..حتى  الموت..لان  اريجها  يضيع  خلف  الضباب..وتعزف   في  داخلي  ايام  العشق  والانتماء  الذروة..ايام  كنا نحتضن  وطننا..نحتضن فلسطين  بين  جناحينا  كحمامة.. نعيشها  كلنا  بكل  جوارحنا..نطعمها  بحنين..نتالم  لالمها..نتضور لجوعها..نبحث لها  في  كل  بقاع  الارض   عن  دواء..وعن  طبيب  متخصص...اااه   يا ام  سعد  انت  وحدك  لم  تصابي  بالزهايمر_فقدان  الذاكرة  المؤقتة_بل  هم  من افتقدوها  قبل  ان  تغادرينا  الى  رب العزة..حافظت  انت  في  جناحك  الخاص  على  فردوسنا  المفقود..وهم  ابدلوا  السياسة  بالدعارة..حين  تجاوزوا  محرمات  الدم؟؟؟!! فمن  كان منكم  بلا  خطيئة  فليرجمني  بحجر...لكن  هذه  المرة  ابتيع  ادب  المقاومة  يا ام  سعد...فلم  يعد  غسان  كنفاني  الماثرة..حاضرا..فتقاسموا  الوطن  بسلطات  بائدة ؟؟!  بسطار الاحتلال في برلمانها...بل  في  خاصرتها ؟؟!!

فهل سيستفيق..الغادرين..الواهمين..البائعين..المدعين..؟؟

فلقد  اضحينا  يا  ام  سعد  اليوم  ..كما  العناكب  التي  تتناكح  فوق  وجوه  الموتى !!!

لم  يدر  هؤلاء  او  يدرون..ان فلسطين  تعني  للفلسطينيين  كلهم  انسانيتهم  بالذات..وما  الانتفاضات  المتعاقبة  سوى  وسيلة  من  وسائل  استعادتهم  لانسانيتهم..وما  التنظيمات  الفلسطينية  كلها ..بلا  استثناء.. سوى وسائل.  اذن  اذا  كنتم  وسائل  فقط ..لاعادتنا الى  انسانيتنا..فلماذا  غلبتم  فئويتكم وحزبيتكم  وحركيتكم..على انسانيتنا...كفى  هراء.!!كفوا  عن هذركم ..ولكنني انا متاكد  ان  للوطن  رب  يحميه..وسيطلع  البدر علينا...ليس  بدركم..انما  بدرنا.نحن  يا  غاشمون..

صبحة...ايها الماجدة..الخالدة  في وجدان  كل  الشرفاء..الذين عرفوك..انت لم  تكوني  الا نتاج  للمسيرة  الكفاحية  الكاملة  لهذا الشعب  العظيم..من  ثورة  القسام  وحركة  القوميين  العرب..وحركة  فتح  العظيمة..والجبهة  الشعبية  لتحرير  فلسطين.حينما  كان  الفدائيين  يحكمون  قطاع  غزة  ليلا  والصهاينة  نهارا ..وتستمر  المسيرة..لترتفع راية حركة  الجهاد..  وصولا  للانتفلضة  الشعبية  العارمة  عام  87    ..التي  انطلقت  في   خضمها حركة   حماس   التي  رفعت  راية  الوطن  فاستبشرنا  خيرا ..فانا لا زال يصن  في  اذني  كلمات  الشيخ  الفاضل  الشهيد  المؤسس  لحركة  حماس..احمد  ياسين..وهو يقول على  التلفاز  الان  قد  ادركنا  ان  صراعنا  مع العدو  هو  صراعا  وطنيا..وليس   صراعا على الدين.وتستمر المسيرة يا ام  سعد  حتى يومنا  هذا  وانت في  هذا الخضم  العظيم  الام  الماجدة  التي  تداولت  حكايات  شعبنا  بعملية  كفاحية  متكاملة  لا  يمكن  لنا  ان  نفصل تتابعها..  فصولها  وعبيرها..ونختزل  بعضنا  البعض..هكذا  كنت  يا ماجدة  عظيمة  كبيرة  متكاملة..اما للبواسل  والعظام..معطاءة  بزخم..لهذا  ستظلي  خالدة.

امي  ايتها  الخالدة  لماذا  تكونين  رائعة  حين  تاتين؟؟رائعة  حتى  وانت  ترتدين  ثياب  الغياب ؟

ام  سعد  اعلمي  يقينا  انني  الملم  فيك  احتراقي...فانت  احتراقي ؟؟لا  ادري يا يمن  كنت  اما  لكل  سجناء  الحرية  مع  اعظم نساء  الارض..من  ام  مروان  عواد..الى  ام  جبر  وشاح...ام  جبر  وشاح   هل تعرفونها..هذه  القديسة  التي لو  خيرتموني..اقسم  لكم  لاخترتها  بدلا  منكم  كلكم  قائدا  حكيما  لهذا  الشعب..ومن  اراد  ان  يدرك  هذه  الحقيقة  فليذهب  الى  حجرها  في  البريج..لعله  يتعلم  من  هذه  المراة النادرة ان  الوطن  حاضرا..باصرارها  وعنادها ورقتها..

لا  ادري  وانا استحضر فيك  هذا المجد يا ام سعد  سامضي بقية  عمري بعيدا  بعيد..وانت  بعمري  حواسي  لا  رفاة..اصرخ  بكل  اوجاع  الارض  ااه..نعم  ااه..يا  دمع  الحجر..يا  اميرة  الرماد  المستتب..هل  سنغلق  اجسادنا..وستبقى  الدائرة  لم  تكتمل..؟؟!!

سابقى يا خالدة  اشحذ  الهمم  بذكرى  استقبالك  على  شبك الزيارة  حين  يلتقي   فمي  بفمك  العذب..لاستقبل  كبسولة.*كما  اصطلح  على  تسميتها  في السجون*لابادلك  الحب  والقيلة  بكبسولة  اخرى..كانت  اعذب قبلة..فيها  الحنين  والثقافة  والاسماء السرية..فيها  الوطن  محمولا  بالخوف  والجراة..في  القيد..رغم  عن  انف  الجلادالص.

صبحة  ..اعلمي  يا  غالية  انني  سافصل  القلب  عن  شرفة  السفر..واشحذ  ضفائر  الحزن في  رحلتي  القادمة..استلهم  فيك  اصرارا  واعدا..وانت  تحملي بين  ثناياك..سلتك  البلاستيكية..لتنقلي  العتاد..الى  رفح..والى  جباليا  الصمود..لكي  يوجع  الابطال  العدو..في  انتفاضتهم  الاولى  الصادقة  العظيمة.

كم  يستفيض  الكلام  يا  ام  سعد..      كم  يرسو  الزمرد  في  عينيك  ويحنو..هي  نعم  يا  حبيبتي  موائد  عشق..لان  خطاك  دائما  كانت  ولا  زالت  خطا  الاوطان..التى  ارادوا  بيعها فرفضناهم..وانا هنا لم  اشا  ان  يوقظني  الحزن..حين  تخفيك  يا  ام  سعد  الورود  وبراكين  لهوها.

هانذا  اعلن  ياام  سعد  لكل  من  يقراني  انني  لا  اكتب خاطرة..بل اسطر  بدقة  ما يجيش  في صميمي  بوعي  الرجال  الواعدين..بكل  ما  امتلكت  من  بحر  الوطن  من عطاء  وخبرة..ودراية  للكثير  الكثير  مما يجري..لا احاجج  احدا..ولكن  من  اراد..فانا  ذاكرتي لم  تخونني  لحظة  لا  في  العلب  الحجرية  وزنازلن  القهر  الص..مع الحبيب  الاخ  زكريا  التلمس..من اكثر  من  يعرفون  ام  سعد...اومع  شهيد  العزة  والكرامة  الشيخ  عبد  العزيز  الرنتيسي ونحن نشترك  في  التمثيل  الاعتقالي  لسجن غزة المركزل  اواخر عام 89  ..وشواهد  الانتماء.. الانتماء النظيف  لا تحصيها لا  باستيلات  العدو  الص..ولا  ارض  الفعل  في  كل  حواري  وازقة  قطاع  غزة  كخصم  لكل الاشقاء..وكند للاعداء  الصهاينة..فحاشى  وكلا  من  مدح  الذات  هنا..

لهذ  كله اصرخ  فيكم..من  اعلى  منابر  العطاء..استحلفكم  بالله  وبالوطن وبام  سعد  التي  لن  تجدوا سنتيمتر  في جسدها  الا   توجع  من  ضربات  الصهاينة..وها هي  قد  رحلت  الى  ربها..ان  تعيدوا  الوطن  الي نصابه..وان  تحذوروا  اولا من  انفسكم..واجهزة  عدوكم الامنية انتم  اخبر  بها..وان لا  تبحثوا  لهروبكم  عن مخارج  واهية...فكفاكم  خرابا!!!!!!

لا  تقتليني  يا  ام  سعد...ارجوك..لئلا  يختلج  الناي  في  غربتي..لئلا  يتعاقب  علي  الغزاة..لئلا  تفر  الذكريات من  قطاف  الاغاني...فانا  وانت  في  محياك  وفي  مماتك   ..كلانا  يا  غالية  يلهب  وحشته  بهذه  الذكريات.

لك  ولكل  الشهداء الابرار  البقاء

في جنات النعيم

..2.4.2008 ابنك  سعدي  عمار