* سجناء الحرية ..بين  المطرقة  والسنديان - بقلم سعدي عمار

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 سجننا  لن  يدوم  الظلم  فيه..وها  شبابنا قلعة  فيه...

,وحدو صفوفكم اخوتي..بفتحنا بجيشنا  بالجبهة..بثوار غزة والضفة..وكل من  يقف في  دربنا  نفنيه..

ابو   الفحم  سطر اسطورة  وكان  لشعبي  شعلة  وروحه  في   عسقلان وردة..وكل  من  يقف في دربنا  نفنيه

                           سجننا لن  يدوم  الظلم فيه

بهذه  الانشودة  الصغيرة..كنا دائما في  احتفالنا  بيوم  السجين  نفتتح  حفلنا بالسجون الص..بهذه  المعايير الصادقة  كانت  كلمات  الصامدين  تصرخ  في  الاعالي..تحديا  صادقا للسجان  في باستيلات  العدو  الصهيوني..

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تحديا  واعدا  لمدير  مصلحة  السجون  الاول   فردهايمر..الذي    اعلن  في  حينه  اننا   نهدف  من  افتتاح  السجون  وتوسيع  دائرتها  *الى  افراغ  المناضل  الفل  من  محتواه  الثوري..وتحويله  الى  اداة طيعة  في  يد  الاحتلال*.

 

هذا  هو  برنامجهم  الذي  ما  فتيء  يتجدد..ومع  اعلان  هذه  المعركة  في اواخر  الستينات  واوائل  السبعينات  التي  كانت اعقد  مرحلة  يعيشها  السجين  الفل..من استخدام  كل ادوات  القمع  والفاشية..من   قمع  وتنكيل  وبطش  يندى  له  الجبين.. حين  كانت  الثورة  ممثلة  بكل  فصائلهاالوطنية  في  اوجها تضرب العدو  في كل مكان..في  ذلك  الزمن  احتدمت  المعركة سجالا  بين السجين الفل  والسجان الص..استخدم  العدو  كل  بشاعات  الكون  لاخضاع السجين  الفل  كاداة  طيعة  في يده..من قمع وحبس  انفرادي  وزحمة  غرف  للمساجين  لا  تختلف  عن اسطبلات  الحيوانات..كان   يعيش  في  غرفة لا  يتجاوز  مساحتها العشرين  مترا  اكثر  من  اربعين   سجين  ..اي  بمعدل نصف  متر  لكل  سجين..في غرفة ياكل  ويشرب  ويستحم ويدخل  دورة  المياه  وينام  بها.

 

  هذا  عدا عن فرز  المساجين  بين مطيع  ومتمرد..اقصد..ان  قسوة الالم والمعاناة  كانت تجعل  الكثير  من  المساجين  يخضعون  لاوامر  القمع  مغلوبين  على  امرهم..وهناك  جملة واعدة  من  الرجال  الصناديد  الذين  تمردوا  على  اوامر   السجان  وتصدوا  لها  ..لا  بل بداو  يبحثون  عن  اساليب  وسبل  للحد  من  الهجمة  التي  تمارس  عليهم  لتطويعهم.

 

     ولان  السجين  الفل  ضاقت  به  الدنيا  في  ظل  تشابك  وتعقيدات  المرحلة..من  خروج امتنا العربية  من  كارثة  وانتكاسة  سيلسية  عنوانها هزيمة  حزيران 1967..وغياب  م.ت.ف عن  اسراها  لقلة  الخبرة  حينها..وتركيزها  على  جوانب  العمل  الكفاحي.. وجد السجين  الفل  نفسه  انه  امام  معركة  ذاتية  عنوانها  فقط  اداة  وحيدة  يمتلكها  وهي  *ارادته*هذه  الارادة  الموزعة  بين  قوية  وضعيفة  وهشة  ..اضطر  السجين  لاستخدامها  رغم العذابات المترتبة  على  ذلك..وبعين  ثاقبة  في  بحث  الممكن..ودراسة  الواقع  السيء..ارتاى  السجين  الفل  ان  ارادته  الحديدية  تستوجب  عليه  ان يفتح  اضرابا مفتوحا  عن  الطعام..ضد  ادارة  السجون  الص..في  المرة الاولى استخدمت ادارة  السجون ابشع  الوسائل  لاحباط  هذا  الاضراب  كاجبار المساجين  على  الاكل  بالقوة..ومع  ضعف  تماسك  التنظيمات  في  حينه  وقلة  الخبرة ..وبالتالي  سوء ادارة  الاضراب تمكنت ادارة  السجون  من افشال  الاضراب..ولكنها  كانت  المقدمة..ليشتد  عود  المساجين  وتتكاتف  الجهود  والهمم  لفتح  اضراب  ااخر عن  الطعام  لتحسين  شروط حياتهم  اليومية..وتتمكن  الحركة  الاسيرة  بعنفوان  رجالها  البواسل  من  النجاح  في  هذا الاضراب الذي  استشهد على  اثره  الشهيد  البطل..عبد  القادر  ابو الفحم..الذي اصبح  رمز  البطولة  والشهادة  في السجون  وعنوانا  اصيلا  للمساجين  يحتذى به..وتستمر  حالة  التصدي  والاباء  سنة  بعد  سنة..ويقوى  عود  المساجين..ويتقدم الشهيد  تلو  الشهيد..من  عمر القاسم..الى  اسحق  مراغة..الى  راسم  حلاوة..والقافلة  طويلة..وتشتد  بشاعة  السجان  من  حرمان  لابسط  حقوق  البشر..حتى  تمكنت  الحركة  الاسيرة  بقوة  ارادتها  وصمودها  من ان تفرض  وجودها  كحالة  منظمة..تصيغ  تنظيماتها كما  تشاء  وتفرض  حضورها  في  كل  السجون..وتمكنت  من  نظم  علاقاتها  ببعضها  حتى  اصبحت  كالجسد  الواحد..اذا  اشتكى عضو..تداعت  له  باقي  الاعضاء...اصبحت  بنلانا  مرصوصا  متكاتفا..متعانقا..متالق..وفتحت  خطوطها  بالخارج  مع  تنظيماتها  بالوطن المحتل  وخارجه..وفتحت  علاقات  مع  بعض  المؤسسات  الانسانية بالخارج..ووطدت  علاقاتها  باهلنل  بالوطن المحتل   بالضفة والقطاع..وشدت  اواصر  العلاقة  والثقة  باهلنا  بالوطن*48*..حتى  اصبحت  الحركة  الاسيرة  جزء  اساسي  من  الحركة  الفل  بل  في  مقدمتها  نضاليا  ورمزية  شامخة  للشعب  الفل...انتصرت  بكل  فخر  على مديرية  السجون..وقائدها  فردهايمر..

 

ولست هنا بمعرض  استعراض  لكفاحية  ونضالية  الحركة  الوطنية  الاسيرة..الصامدة..فالاخ  والصديق  عبد الناصر  فروانة.*مدير  دائرة  الاحصاء  في  وزارة  الاسرى*  والمتخصص  بشؤون الاسرى..وصاحب  الخبرة  بشؤون  الاسرى  كاسير  سابق..كتب بتفصيلية  عميقة  واحصائية  عن تاريخ  وحالة  السجين  الفل..ماضي وحاضر..في  تقرير  وثائقي  رائع وجميل  بامكان  الجميع  ان يطل  عليه  من  خلال  موقعه  الخاص *فلسطين  خلف القضبان*  ومواقع  اخرى.

 

ما  اود  ان الفت  الانتباه  له  في  هذا  المقام  ونحن  يطل  علينا يوم  السجين  الفل..الذي  اصبح  في دائرة  هامشية  واحزابنا  وحركاتنا  تبحث  عن  ذاتها..اود  ان  اتحدث  عن  قضيتين  اساسيتين تتعلق  بالسجين  الفل  لعل  وعسى  ان  تستفيق  النفوس  النائمة..وترتقي  لمستوى  كفاحية  ونضالية  ومعاناة  الاسير  الفل..

 

اولا..الازمات  الاساسية  التي  يعانيها  السجين  الفل..1..ازمة  الحرية

 

2..ازمةالانتماء

 

3..ازمة  الجنس

 

ثانيا..الانجازات    التي ارتقت بها  الحركة  الاسيرة..بحيث  اصبحت  جزءا  ااساسيا  من اعمدة العمل  الكفاحي  الفل..

ولن  اخوض  في  تفصيلية...في  توضيح  هذه  الازمات  بالقدر  الذي  سالقي  الضوء  عليها  والكيفية  التي  يتم  التصدي  لهذه  الازمات..خصوصا  وانها  متداخلة  بعمق  بحيث  لا  يمكن  فصل  ازمة  عن  الاخرى.

 

1..ازمة  الحرية..وهي  هنا ازمة   غنية  عن  التعريف..بمعنى  ان  تسلب  حريتك..بان تنعم بحرية بين اهلك  وذويك تحرم  من  ان  تعيش  فرحا..اوحزنا لاخوك  وصديقك..او  لاامك  وابوك..وهذه  ابسط  حريات البشر..ومادام  الوطن  سليبا..فان  ازمة  الحرية  بالنسبة  للمناضل  الفل  هي  ازمة  نسبية...وبالتالي  التصدي لهذه  الازمة  كان  له  معنى  عام ومعنى  خاص  لدى  السجين ..عام  بان مايجري  لاهلنا في الوطن المحتل  من  قمع  وقتل..ومصادرة  حقوق  وسلب  لانسانية  الشعب..وهدم  بيوت..و..و..و كل  هذا  يشد  من  ازر  السجين  يصلب عوده  ويقوى ليكمل  مسيرته..وخاص .. بان  تمكنت  الحركة  الاسيرة  من  خلق  مجتمع  فلسطيني  داخل  السجون ..له  خصوصية..رائعة  بسلوكها متقدمة  في  علاقاتها..انصح  التنظيمات الفل  حاليا  باعادة  قرائتها.. علها تستفيد  من جبروت  السجين  الفل...وتستطيع  نظم  علاقاتها  الحالية. فالمتضرر  الاول  من  ما  يجري  حاليا  هو  السجين.

 

وكما قلت  تمكنت  الحركة  الاسيرة  من  خلق  مجتمع..له  ضوابطه  من  الصباح  وحتى  ساعة النوم    لا يجد  احيانا  الاسير متسع  من الوقت..فالقراءة  الذاتية اجبارية  وبمعدل  جلستين ثقافيتين يوميا  وساعتين  *للفورة*للخروج  للشمس  واستنشاق  الهواء  ومقابلة  الرفاق  والاخوة  في  الغرف  الاخرى  وبعض  الساعات  للعب  الشطرنج..ورؤية  التلفاز  بعد  تحقيقه  كانجاز  بعد  عام  1984  ..كل  ذلك  واشياء اخري  كانت  تجعل  من  السجين  بانه   ليس  معزولا  بل  في  قلب  الحدث  وجزء  اساسي  من  المعركة  العامة.

 

ازمة  الانتماء..وهنا  نقصد  ان  الكثير  من  الاسرى  قبل  اعتقالهم  وحينما  ينتمون الى  تنظيماتهم ..ينتمون  بحس وطني  ومشاعري   وحماسي اكثر  منه  ارتباط  واعي  وناضج  ومتجذر..فتحدث  حالة  الاصطدام  بين  ان  تدفع  ثمنا  غاليا  جدا  مقابل  انتماءك  ..فاما ان  تتصدى  او تتساقط..وفي  الحالة  الثانية كان  للاسرى  نصيب ..ولو  انه  قليل  ولكنه  جزء  من  انتصار  العدو علينا..وفي  هذا الخضم  يعاد  تاهيل  المناضل  الفل  كسجين  في  بنائه  وتوعيته  وتجذيره  حتى  يحترف  النضال..ويصبح  محترفا  ثوريا  يتصدى  بوعي عالي  للاحتلال..والسجون  كانت  لها  الباع الطويل  بل الاول  في  خلق  القادة  المحترفين..؟؟

 

3..ازمة  الجنس..وهي ازمة  جدا  طبيعية..حينما تحرم  من  زوجتك لسنوات..او  تحرم  من  ان تعيش  كباقي البشر  في  ظل  اسرة تحميها  وتحميك..خصوصا  اصحاب  الاحكام  العالية..وهنا  وكما اشرت ضوابط المجتمع  التي خلقها  السجين الفل  مكنته  من الحد  بشكل كبير من تجاوز  هذه  الازمة..اضافة الى  ان  الضرورات تقتضي  ان تفسح  بتلميح  لان  يعيش الانسان  بينه وبين ذاته  لتجاوز  الحالة.

وبنظرة  متفحصة نجد  ان  ازمات  السجين  هي ازمات انسانية  ونضالية  معقدة..ومتداخلة..خرج  فيها  ولا  زال بانتصار  على ذاته  وعدوه  اللدود...خروجا  يستدعى  الفخر بهؤلاء العظماء..الشهداء مع  عدم  التنفيذ.

 

واما ثانيا..فساسوق  عناوينا لما  انجزته  الحركة  الوطنية الاسيرة..

 

1..اصبحت  الحركة  الوطنية  الاسيرة  رافدا  اساسيا  لمد  الثورة  بالكادر  والقائد والمناضل    المتجذر    والصلب..ليخرج  ويواصل  العملية  الكفاحية..باحتراف  ووعي  بل  وبمتعة...فينخرط  بالمؤسسات  الجماهيرية  هنا  ويقود  العمل  السري هناك  ويدير العملية الكفاحية  في  موقع  ااخر  بجدارة  عالية  والشواهد  كثيرة  ولا  تحصى.

 

2..الحركة  الاسيرة  كانت  المحرك  الاول  لجماهير  شعبنا  بالداخل تحديدا ..  وتحديدا  كانت المحرض  الاول  لاخراج  المسيرات  والمظاهرات  العارمة  وخصوصا في  المناسبات الوطنية  كيوم  الارض  ويوم  السجين..وحينما  كانت  تعجز  المنظمات  الطلابية  والمؤسسات  النقابية  وغيرها  وحتى  التنظيمات  بنداءاتها  في تحريك  الشارع  الفل ..كانت  السجون  بحركة  نضالية  صغيرة  تقلب الارض  المحتلة  راسا على  عقب  على  رؤوس  الصهاينة.

 

3..اصدار العديد  العديد  من  الكتب والكتابات  الامنية  والنضالية  والثقافية  كنموذج  رائع  للتنوير  والبناء  الراسخ  والترشيد  الحي  للعمل  السري واسسه  وطرائقه..ونصيحتي  الثانية  ان يبحث  كل  فل  عن  كتاب..*فلسفة  المواجهة  وراء  القضبان.*ليقرا  هذه التعاليم الرائعة..

 

بهذا  أحبتي   اطوي   على  شرفة  من جنوني...حنينا..نعم  حنينا..فمن  يحاول  دفن  الشتاء.....انه  المطر  الذي  تشرده   جوازات  السفر...والربيع    عطره  حتما  ..قادما..يضحك  من  بكاء  الروح...تغتصب  الكلمات  من حلقي..فنحن  لن  نوفي هؤلاء  حقهم..ما  دمنا  نقسم  الوطن...!!!!!!!

 

*  سعدي  عمار : أسير سابق

 

 16-04-2008