سبارتاكوسْ.....- شعر علي حتر 

هل كان سْبارتاكوس سُنِّيا..

شيعيا..

درزيا..

نصرانيا..

أَمْ عبداً مسحوقا..

منهوبا..

مسلوبا..

وثنيا..

ولكل عبيد الأرض وفيّا..

فقضى مصلوبا..

مع أنه.. ما كان.. من الله نبيا..

جُرْمه.. أنّه..

ما طأطأ رأسه يوما..

قُدّام غنيٍّ..

ما شارك في الودّ  

وما صدّق بالوعد غنيا..

ما شاور..

ما حاور..

ما ناور..

ما سار مع الأزلامْ

أو بين الغلماْنْ..

ما استجدى الغفرانْ..

أيضا.. أيضا..

لم يقبل أن يسقط..

أن يغدوَ

بالرشْوة سرا.. في اقبية التحقيق

ثريّا..

بل أعلن موقفه في درب الآلام..

ودرب الأحزان..

من فوق صليب خشبيٍّ..   

ما أقسى الصلبان..

"سأقاتل ويقاتل أبنائي..

من أجل الإنسان.."

من أجل الإنسان..

لم أقرأ في كتب التاريخ سوى

أن سبارتاكوسْ كان

في علم الظلم..

على الظلم عصيا..

 

 

 

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safsaf.org - 22-01-2013